फूँकने की तकनीकें
मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।
किसी भी सुषिर वाद्य में फूँक संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण है। बाँसुरी की बनावट और गुणों के साथ फूँक उसका नाद नियंत्रित करती है। साफ़, भावपूर्ण फूँक संगीत में जान डालती है। सरल स्वरक्रम भी साफ़ फूँक और सही स्वरों से बजाएँ, तो संगीत लगता है।
साफ़ फूँक
कम से कम ये गुण होने चाहिए:
- दो सप्तकों के सभी स्वर सहजता से बजें। शुरुआती विद्यार्थियों के लिए खासकर निचले और ऊपरी स्वर कठिन होते हैं।
- म से प का सप्तक-बदलाव बिना स्पष्ट टूटन के हो। म में सभी छेद खुले और प में बंद होते हैं। उँगलियाँ बदलने के साथ फूँक का दबाव भी दोगुना करना पड़ता है। कई शुरुआती विद्यार्थी बहुत ज़ोर लगाते हैं, जिससे बदलाव कठोर लगता है।
- सभी स्वर अनावश्यक फुफकार के बिना बजें। फुफकार और फूँकने के छेद से स्वाभाविक रूप से आने वाले सूक्ष्म नाद में अंतर पहचानें।
- एक ही स्वर की ऊँचाई बदले बिना अलग-अलग तीव्रता में बजा सकें। तेज़ या हल्की फूँक से स्वर ऊँचा-नीचा होता है। होंठों की स्थिति या बाँसुरी को अंदर-बाहर घुमाकर उसकी भरपाई कर सकें।
- कम से कम 30 सेकंड तक एक स्वर साफ़ और स्थिर बजा सकें, बिना नाद बदले।
बजाने से पहले रुककर सोचें कि बाँसुरी की आवाज़ कैसी चाहते हैं। इससे मदद मिलती है।
आवाज़ की तीव्रता
तीव्रता का नियंत्रण बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमेशा समान आवाज़ में बजाना एकरस लगेगा। कुछ स्वर तेज़ और कुछ हल्के बजाने से प्रस्तुति का प्रभाव बढ़ता है।
सरल रूप में हल्की फूँक से आवाज़ धीमी और ज़ोर से तेज़ होती है। लेकिन वास्तव में दबाव बदलने से स्वर अपनी जगह से ऊँचा या नीचा भी होता है। उसकी भरपाई करनी होगी। सामान्यतः ऊपरी-निचले होंठों की गति से, या कभी बाँसुरी को बाहर-अंदर घुमाकर यह किया जाता है।
आवाज़ कम करने के लिए हल्के फूँकें, तो स्वर नीचे जाने की प्रवृत्ति रखेगा। उसकी भरपाई के लिए ऊपरी होंठ को सामान्य स्थिति से थोड़ा पीछे और निचले को थोड़ा आगे करें। आवाज़ बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ाते हुए ऊपरी होंठ को थोड़ा आगे करें।
बाँसुरी घुमाकर भी सुधार कर सकते हैं। ऊँचे हो रहे स्वर को सँभालने के लिए अंदर की ओर घुमाएँ। नीचे जा रहे स्वर के लिए बाहर की ओर।
कंपन या विब्राटो
कंपन हिंदुस्तानी संगीत में गमक या अलंकरण का रूप है। अलंकरण के बारे में यहाँ पढ़ें। पश्चिमी संगीत में इसे विब्राटो कहते हैं। विवेकपूर्ण उपयोग लंबे स्वरों में रंग और जीवन लाता है तथा आलाप सँवारता है।
बाँसुरी में कंपन के लिए फेफड़ों और उदर को अलग करने वाले डायफ़्राम पर नियंत्रण चाहिए। “हा” कहते समय इसका प्रयोग होता है। इसलिए फूँकते हुए लगभग “हा हा हा हा” कहने जैसा करें। तेज़ कंपन की तुलना में धीमा, नियंत्रित कंपन अधिक कठिन होता है।
फूँक और सहनशक्ति
शुरुआत में क्षमता की कमी से कई बाधाएँ आती हैं। बाँसुरी की सहनशक्ति सौ मीटर दौड़ने की क्षमता जैसी नहीं। साँस गहरी, एकसमान नियंत्रित और उदर-आधारित होनी चाहिए। इसमें उदर-क्षेत्र का उपयोग होता है। जल्दी साँस लेना और धीरे छोड़ना भी आना चाहिए—कुछ तैरने की तरह।
ये गुण प्राणायाम की साँस से मिलते हैं। साँस की आदतों पर नियंत्रण में समय लगता है, इसलिए शुरुआत कठिन और निराशाजनक हो सकती है। कभी सिर हल्का या अस्थायी चक्कर महसूस होता है। उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास शुरू करते समय मुझे भी यही अनुभव हुए। ये अक्सर अस्थायी होते हैं और रुकने के एक-दो मिनट में मिट जाते हैं। हृदय या रक्तसंचार की समस्या हो, तो प्रयास से पहले चिकित्सक की सलाह लें।
समय और अभ्यास से वादन की क्षमता बढ़ती है। स्वर-वाक्यों और रचनाओं के बीच छोटे विराम लेना भी सहायक है। याद रखें, बाँसुरी सितार जैसा लगातार बजने वाला वाद्य नहीं है।