सुर की शुरुआत

मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।

सबसे पहला कदम बाँसुरी से साफ़ आवाज़ निकालना है। आपकी फूँक से भीतर बनने वाला हवा का भँवर ध्वनि पैदा करता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सीधे छेद के भीतर फूँकने से यह भँवर नहीं बनता। फूँक छेद के सामने वाले किनारे पर पड़नी चाहिए। अच्छी बाँसुरी में निर्माता इस किनारे को मोटी दीवार जैसा छोड़ने के बजाय धारदार बनाता है। इसी कारण बाएँ और दाएँ हाथ से बजाने वाली बाँसुरियाँ अलग होती हैं।

शुरुआत इस विचार से करें कि फूँक किनारे पर ऐसे पड़े कि लगभग आधी हवा अंदर जाए और आधी बाहर निकले [1]। सही आवाज़ आने तक बाँसुरी को बिल्कुल सही पकड़ने की चिंता न करें। उसके बाद उँगलियों पर ध्यान देंगे। आईने के सामने खड़े हों ताकि फूँकने का तरीका देख सकें। छेद को होंठों के बीचोंबीच रखें। निचला होंठ लगभग पाँचवाँ हिस्सा ढके। निचला होंठ ढीला हो और ऊपरी होंठ उस पर थोड़ा दबाव डाले, ताकि फूँकते समय साँस निकलने में कुछ प्रतिरोध महसूस हो।

रूपक कुलकर्णी की बाँसुरी और होंठों की स्थिति

तस्वीर में बाँसुरी होंठों की सीध में है। हवा की धार क्षैतिज दिशा में लंबोतरी होनी चाहिए। गोल धार से अच्छी आवाज़ नहीं आती। होंठ ऐसे हों जैसे “फ्…” कह रहे हों, न कि “ऊ…”। धार बहुत चौड़ी न हो। छेद से चौड़ी होने पर बहुमूल्य हवा ध्वनि बनाए बिना निकल जाती है। बहुत सँकरी होने पर आवाज़ पर्याप्त तेज़ नहीं होगी। वास्तव में सँकरी फूँक से आवाज़ की तीव्रता नियंत्रित की जाती है, लेकिन अभी उसका प्रयास करना जल्दबाज़ी होगी।

हथेली पर फूँककर उसका असर समझ सकते हैं। हवा की धार एकसमान और केंद्रित महसूस होनी चाहिए।

इस तरह अभ्यास करें, जब तक लंबी और साफ़ आवाज़ न निकले। इसमें थोड़ा धैर्य चाहिए। पहले दिन संतोषजनक साफ़ स्वर मिलना असंभव नहीं, लेकिन बहुत कम होता है। कुछ दिनों में मेहनत रंग लाएगी और आप आगे बढ़ सकेंगे।

क्या आवाज़ निकली?

हाँ? बहुत अच्छा, अब अगले कदम पर जाएँ। नहीं निकली, तो इन संभावित गलतियों को जाँचें:

  1. बाँसुरी होंठों की सही सीध में है? छेद का मध्य होंठों के बीच बने रास्ते से मिल रहा है?
  2. क्या फूँक सामने वाले किनारे पर पड़ रही है, सीधे भीतर नहीं? यह बहुत आम गलती है।
  3. हवा की धार बहुत चौड़ी या बहुत सँकरी तो नहीं?
  4. क्या बहुत ज़ोर से फूँक रहे हैं? आवाज़ के लिए बहुत ज़ोर नहीं चाहिए। उलटे उससे तीखी सीटी जैसी आवाज़ आ सकती है।

साफ़ आवाज़ निकालने में धैर्य चाहिए। एक सप्ताह लगे तो आश्चर्य न करें। समय लें और संयम रखें। अभी लगाया गया समय आपकी नींव मज़बूत कर रहा है और सही तरीके का लाभ आगे मिलेगा।


[1] इस विषय पर मतभेद हैं। कुछ वादक अधिक हवा भीतर भेजना पसंद करते हैं। उससे स्वर का रंग थोड़ा अलग होता है। बाँसुरी की आवाज़ में हवा का अंश कितना हो, यह व्यक्तिगत पसंद है। कुछ उसे कम करने का प्रयास करते हैं। मुझे हल्का हवा का भाव पसंद है, क्योंकि उससे बाँसुरी अत्यंत सटीक यांत्रिक वाद्य के बजाय अधिक प्राकृतिक लगती है।