श्रवण अभ्यास
मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।
पियानो जैसे पश्चिमी वाद्य इक्वल टेम्परामेंट, यानी समान स्वरांतर पद्धति, में मिलाए जाते हैं। विचार सरल है: स्वर और उसके ऊपरी सप्तक के स्वर—दोगुनी आवृत्ति—के बीच बारह समान भाग करें और हर भाग पर स्वर रखें। यह अंतर कुल 1200 भागों में मापा जाता है। हर भाग “सेंट” है और हर सौवें सेंट पर स्वर है। संगीतकार मानक से नीचा या ऊँचा स्वर बताते समय सेंट में अंतर बताते हैं, जैसे दो सेंट नीचा या चार सेंट ऊँचा।
इस पद्धति का तर्क सीधा है। कीबोर्ड का कोई तय शुरुआती या अंतिम स्वर नहीं। कलाकार किसी भी स्वर से शुरू कर सके, इसके लिए समान अंतर उपयोगी है।
हिंदुस्तानी संगीत का विचार अलग है। शुरुआत हमेशा सा मानी जाती है और तानपुरा उसी पर मिलाकर संदर्भ रखा जाता है। तानपुरे के तारों की परस्पर क्रिया हार्मोनिक आवृत्तियाँ बनाती है, जो मूल आवृत्तियों के गुणज या अनुपात होती हैं। कलाकार अपने स्वर इनसे मिलाए, तो तानपुरे का नाद उन्हें सहारा देता है। जो स्वर इन हार्मोनिक से न मिलें—और समान अंतर वाले स्वर नहीं मिलते—वे उतने अच्छे नहीं लगते।
इसलिए हिंदुस्तानी कलाकार जस्ट स्केल में गाते-बजाते हैं। नीचे की तालिका जस्ट और समान स्वरांतर पद्धतियों का संबंध दिखाती है। सारी गणना याद रखना ज़रूरी नहीं। अंतिम स्तंभ के अंतर आगे क्रोमैटिक ट्यूनर के उपयोग में काम आएँगे।
| स्वर | अंतराल | जस्ट अनुपात | दशमलव | समान स्वरांतर अनुपात | अंतर | सेंट में अंतर |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | एकस्वर | 1 | 1.0000 | 1.0000 | 0.0000 | 0 |
| कोमल रे | लघु द्वितीय | 25/24 | 1.0417 | 1.0595 | -0.0178 | 12 |
| रे | दीर्घ द्वितीय | 9/8 | 1.1250 | 1.1225 | 0.0025 | 4 |
| कोमल ग | लघु तृतीय | 6/5 | 1.2000 | 1.1892 | 0.0108 | 16 |
| ग | दीर्घ तृतीय | 5/4 | 1.2500 | 1.2599 | -0.0099 | -14 |
| म | चतुर्थ | 4/3 | 1.3333 | 1.3348 | -0.0015 | -2 |
| तीव्र म | न्यून पंचम | 45/32 | 1.4063 | 1.4142 | -0.0080 | -10 |
| प | पंचम | 3/2 | 1.5000 | 1.4983 | 0.0017 | 2 |
| कोमल ध | लघु षष्ठ | 8/5 | 1.6000 | 1.5874 | 0.0126 | 14 |
| ध | दीर्घ षष्ठ | 5/3 | 1.6667 | 1.6818 | -0.0151 | -16 |
| कोमल नि | लघु सप्तम | 9/5 | 1.8000 | 1.7818 | 0.0182 | 17 |
| नि | दीर्घ सप्तम | 15/8 | 1.8750 | 1.8878 | -0.0128 | -12 |
| तार सा | अष्टक | 2 | 2.0000 | 2.0000 | 0.0000 | 0 |
अब सिद्धांत को व्यवहार में कैसे लाएँ? कान को विस्पंद सुनना सिखाना है, यह समझ गए। लेकिन परंपरागत शिक्षा की तरह गुरु से तुरंत प्रतिक्रिया न मिले, तो सही स्वर लगने का पता कैसे चले?
सौभाग्य से आधुनिक तकनीक ने क्रोमैटिक ट्यूनर जैसा सरल उपकरण दिया है। उसके बारे में नहीं पढ़ा, तो पहले थोड़ा समय देकर पढ़ें।
हिंदुस्तानी संगीत के शिक्षक अच्छे कारणों से इसे कम इस्तेमाल करते हैं। पहली बात, परंपरा में गुरु शिष्य को आमने-सामने सिखाता है और स्वर-मिलान तथा श्रवण-अभ्यास सहित हर पहलू में मदद करता है। दूसरी बात, ट्यूनर समान स्वरांतर दिखाता है, जबकि हिंदुस्तानी संगीत पूर्णांकीय आवृत्ति-अनुपातों पर आधारित है। स्वर की सटीक जगह कभी राग के अनुसार भी बदलती है।
लेकिन ट्यूनर के संकेत की तुलना में जस्ट स्वर की जगह पता हो, तो उससे कान का अभ्यास कर सकते हैं। इन अंतरों की गणना का गहरा अध्ययन भी किया जा सकता है; आसान तरीका है पृष्ठ छापकर अंतर वाली तालिका काटें और अपने ट्यूनर पर लगा लें।
तालिका की गणनाओं का रचनात्मक उपयोग करके हिंदुस्तानी स्वर की जाँच कर सकते हैं, बशर्ते बताए अंतर के अनुसार बजाएँ। उदाहरण के लिए प को ट्यूनर के सही स्वर से दो सेंट ऊपर रखना होगा।
इसके कई लाभ हैं, खासकर कान तैयार करने में। बाँसुरी का सही स्वर फूँक के दबाव और कोण पर निर्भर है, इसलिए शुरुआत में उसे सटीक लगाना कठिन होता है। तब ट्यूनर उपयोगी हो सकता है।
यह गुरु-शिष्य शिक्षा की जगह नहीं लेता। स्वर राग पर निर्भर हो सकते हैं। भैरव और मारवा दोनों में कोमल रे है। भैरव में वह सा की ओर झुकता है, मारवा में शुद्ध रे की ओर। ये सूक्ष्मताएँ गुरु ही सिखा सकता है।
अधिक जानकारी
- हाउ इक्वल टेम्परामेंट रूइन्ड हार्मनी (ऐंड व्हाय यू शुड केयर)—संगीत की ध्वनि के गणित और पश्चिमी संगीत में उसके उपयोग को समझाने वाली सुंदर, सरल पुस्तक।
- 22 श्रुति—भारतीय संगीत की 22 श्रुतियों के पीछे का विचार और चर्चा।