आवश्यक साधन — तानपुरा
मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।
बाँसुरी का उद्गम मानव इतिहास के बहुत शुरुआती समय में हुआ। इसीलिए वह सरल वाद्य है। यही सादगी लोकसंगीत में उसकी व्यापक लोकप्रियता समझाती है। उत्तर भारत का कोई ग्रामीण बालक स्थानीय बाँस से उसे बनाकर जंगल में ले जाए और दिनभर लोकधुनें बजाए, तो उसे कौन-से सहायक साधन चाहिए?
सरल लोक, सुगम या फ़िल्मी संगीत बजाने के लिए अच्छी, सुर में बनी बाँसुरी पर्याप्त है। लेकिन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखना चाहते हैं, तो कुछ साधन ज़रूर चाहिए। कुछ अनिवार्य हैं, कुछ मेरी सिफ़ारिशें।
तानपुरा भारतीय शास्त्रीय संगीत की हिंदुस्तानी और कर्नाटक, दोनों पद्धतियों में आवश्यक संगत-वाद्य है। उसे तंबोरा, तंबूरा आदि नामों से भी जानते हैं।
तानपुरा कलाकार के लिए ध्वनि की पृष्ठभूमि देता है। दार्शनिक रूप से वह ब्रह्मांडीय ध्वनि, ॐ, का प्रतीक है। पूरी प्रस्तुति में उसका नाद स्वर का संदर्भ देता है। अधिकांश बड़े कलाकार कहेंगे कि हिंदुस्तानी संगीत की सबसे कठिन बात हर समय तानपुरे के साथ सही स्वर लगाना है।
तानपुरा एक तरह की सरल अनुनाद-पेटी है। बड़े खोखले तुम्बे में ध्वनि गूँजती है। इसके लिए विशेष प्रकार का तुम्बा लिया जाता है, जिसे धूप और गर्मी में सुखाकर खोखला किया जाता है। फिर उसे खोखली लकड़ी की लंबी डाँड से जोड़ते हैं।
नाद की गुणवत्ता बहुत हद तक ब्रिज पर निर्भर है—तुम्बे की ओर वह सफ़ेद हिस्सा जिस पर तार टिकते हैं। उसकी सतह का कोण और घुमाव आवाज़ पर गहरा असर डालते हैं। जवारी बढ़ाने के लिए अक्सर तारों के नीचे छोटे धागे रखते हैं, ताकि वे ब्रिज से थोड़ा ऊपर उठें।
पारंपरिक तानपुरे में चार तार होते हैं। बीच के दो सा पर, चौथा एक सप्तक नीचे मंद्र सा पर मिलाते हैं। पहला राग के अनुसार प, म या नि पर मिलता है। आज कई कलाकार दूसरी स्वर-व्यवस्थाएँ भी अपनाते हैं। कुछ पाँच या छह तारों वाले तानपुरे में ग–प–सा–सा–सा या प–नि–सा–सा–सा जैसे अपरंपरागत मेल रखते हैं।
हाल के वर्षों में साथ ले जाना आसान बनाने के लिए छोटा तानपुरा बनाया गया, जिसे इंस्ट्रूमेंटल तानपुरा कहते हैं। इसमें तुम्बा नहीं होता। पूरा खोखली लकड़ी का शरीर अनुनाद-पेटी बनता है। कभी स्वर अधिक देर टिकाने के लिए गिटार जैसे लपेटदार तार लगाए जाते हैं।
अधिकतर गायक अभ्यास में अपना तानपुरा स्वयं बजाते हैं। बाँसुरीवादक के लिए यह संभव नहीं। सौभाग्य से आधुनिक तकनीक कई इलेक्ट्रॉनिक तानपुरे देती है। कुछ बैटरी से भी चलते हैं। कई का नाद वास्तविक तानपुरे के बहुत करीब है। रैडेल का मैस्ट्रो-एस स्टीरियो मॉडल अच्छे विकल्पों में है। उसका नाद वास्तविक लगता है और दो तानपुरों के मोड में भी चल सकता है। बैटरी से भी चलता है। रागिनी डिजिटल तानपुरा दूसरा लोकप्रिय मॉडल है।
इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा लेते समय डिजिटल प्रकार चुनें। एनालॉग तानपुरों का गर्म होने पर स्वर बदलने के लिए जाना जाता है।