आवश्यक साधन — तबला
मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।
तबला हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की किसी भी मैफ़िल का अभिन्न अंग है। वह ताल की संगत देता है। इसमें दो वाद्य होते हैं—छोटे व्यास वाला स्वयं तबला कहलाता है और बड़ा बायाँ या डग्गा। तबला लकड़ी का होता है, जिस पर चमड़े का आवरण चमड़े की पट्टियों से तना रहता है। विशेष लेप की परत उसे स्पष्ट, धातु जैसी आवाज़ देती है।
डग्गे या बाएँ की बनावट मिलती-जुलती है, लेकिन लकड़ी के बजाय धातु का ढाँचा होता है। अधिक व्यास के कारण वह गहरे स्वर देता है और उसी काम आता है। चंद्रकांता की वेबसाइट पर तबले की उपयोगी जानकारी मिलेगी।
तानपुरे की तरह तबला आधार स्वर के ऊपरी सप्तक, यानी तार सा, में मिलाया जाता है। कुछ लोग उसे आधार सा पर भी मिलाते हैं। बायाँ सामान्यतः नहीं मिलाया जाता, लेकिन मंद्र सा पर मिला बायाँ सुंदर प्रभाव पैदा करता है।
बाँसुरी के अभ्यास के लिए संगत चाहिए। प्रत्यक्ष तबला-संगत का कोई विकल्प नहीं। अच्छा संगतकार प्रस्तुति के लिए लय का आधार बनाता है और बाँसुरीवादक तथा तबलावादक का संवाद बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। अभ्यास के लिए इलेक्ट्रॉनिक संगत एक व्यावहारिक विकल्प है। बाज़ार में कई मॉडल हैं। मुझे रैडेल का डिजी-60 मॉडल पसंद है, क्योंकि उसे प्रोग्राम किया जा सकता है, उसमें कई ताल हैं और बैटरी लंबे समय चलती है। अन्य मॉडल भी उपलब्ध हैं। सावधानी रखें: कुछ मॉडलों की स्वर-मिलान सीमा ई के बहुत पास समाप्त होती है। इससे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली ई की बाँसुरी के साथ उन्हें ठीक मिलाना कठिन हो सकता है।