संगीत का भौतिक विज्ञान

मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।

इस प्रयोग का उद्देश्य सही स्वर लगने और चूकने के बीच वह अंतर समझाना है, जिसे कान को पहचानना चाहिए।

मूल पाठ का जावा ट्यूनर अब उपलब्ध नहीं है। नीचे के आवृत्ति-संबंधों को क्रोमैटिक ट्यूनर से समझ सकते हैं।

इस प्रयोग में सा और ग बजाकर उन्हें मिलाने का प्रयास करेंगे।

जावा ट्यूनर में मूल व्यवस्था इस प्रकार थी:

  1. स्वरों के घेरे के नीचे ध्वनि के लिए “रिपीट” चुनें।
  2. स्वर-संदर्भ “ए = 440” चुनें।
  3. स्वरों के घेरे में सी चुनें। यह हमारा सा होगा।
  4. शिफ़्ट कुंजी दबाकर ई चुनें। यह हमारा ग होगा।

इससे सा यानी सी और ग यानी ई साथ बजने चाहिए।

ध्यान से सुनें। क्या सुनाई देता है? सी और ई के अलावा तेज़ दोलन जैसी आवाज़ भी सुनाई देती है।

ध्वनि-विज्ञान में इन दोलनों को “बीट्स”, यानी विस्पंद कहते हैं। अलग आवृत्तियों की तरंगों के व्यतिकरण से ये बनते हैं। इनकी दर दोनों तरंगों की आवृत्तियों के अंतर के बराबर होती है। उदाहरण के लिए, एक तानपुरा 440 हर्ट्ज़—प्रति सेकंड चक्र—और दूसरा 436 हर्ट्ज़ पर हो, तो प्रति सेकंड चार विस्पंद सुनाई देंगे।

स्वर मिलाने का अर्थ इन विस्पंदों को हटाना है। कंप्यूटर की नीचे वाली तीर-कुंजी से ई की आवृत्ति घटाएँ। बार-बार दबाने पर दोलन कम होते सुनाई देंगे। आवृत्ति-तालिका में ई का अंतर −14 होने पर वे पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। और नीचे जाने पर फिर लौट आते हैं।

−14 में क्या विशेष है? यहाँ पढ़ें।

सा–प यानी सी–जी, सा–म यानी सी–एफ, सा–ध यानी सी–ए के साथ भी यही प्रयोग कर सकते हैं। हर जोड़ी में विस्पंद समाप्त होने का अंतर अलग होगा। स्वयं खोजने का प्रयास करें।

इन विस्पंदों को सुन और पहचान पाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। किसी के कान को “संगीतमय” कहने से शायद ऐसे अंतर पहचानने की क्षमता ही अभिप्रेत होती है। विस्पंद की दर घटती है तो स्वर अधिक सही होता जाता है, लेकिन विस्पंद सुन पाना भी कठिन होता जाता है।

इस क्षमता में कुछ जन्मजात गुण हो सकते हैं, लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि अभ्यास से संगीतमय कान विकसित किए जा सकते हैं।

बाँसुरी पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। पीछे तानपुरा बज रहा हो और आप सा बजाएँ, तो विस्पंद सुनकर—या उम्मीद है, उनके न होने से—समझ सकेंगे कि स्वर मिला है या नहीं। दो एक-जैसे वाद्यों, जैसे दो तानपुरों या दो बाँसुरियों के बीच यह पहचानना आसान है। तानपुरे और बाँसुरी के स्वर की तुलना में थोड़ा कठिन है, क्योंकि उनकी ध्वनिक विशेषताएँ, विशेषकर आवृत्तियों का स्वरूप, अलग हैं। फिर भी मूल सिद्धांत वही रहता है।

यह रोचक पुस्तक इस सिद्धांत को विस्तार से समझाती है।

फ़िज़िक्स क्लासरूम पर ध्वनि-तरंगों के भौतिक विज्ञान और संगीत में उनके उपयोग की रोचक चर्चा पढ़ें।