मेरे गुरु — पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।

“मेरा रियाज़ मेरी पूजा है। मेरी सरगम और पलटे मेरे मंत्र हैं। संगीत से मैं ईश्वर की शक्ति व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ।”

— पद्मविभूषण पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

मैंने हरिजी को पहली बार 1987 के गुणीदास सम्मेलन में सुना। यह वार्षिक शास्त्रीय संगीत समारोह स्वर्गीय पंडित सी. आर. व्यास अपने गुरु के सम्मान में आयोजित करते थे। तब मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में था। बचपन में हारमोनियम और गायन की थोड़ी शिक्षा मिली थी, लेकिन गंभीरता से नहीं। पढ़ाई हमेशा संगीत से ऊपर रही। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक परीक्षाएँ पार कर लेने से राहत थी और अब संगीत गंभीरता से सीखने की सोच रहा था। हारमोनियम सीखना नहीं चाहता था और गायन शुरू करने की उम्र निकल गई लगती थी—लड़कों के आवाज़-संस्कार के लिए शुरुआती किशोरावस्था सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

गुणीदास सम्मेलन अपने-अपने क्षेत्र के श्रेष्ठ कलाकारों को सुनने का सुनहरा अवसर था। 1987 में उस्ताद अली अकबर ख़ाँ, पंडित रविशंकर, पंडित शिवकुमार शर्मा, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, उस्ताद शफ़ात अहमद ख़ाँ और पंडित अनिंदो चटर्जी आए थे। मानो सब अपने वाद्य और शैलियाँ मेरे सामने रख रहे हों कि मैं चुन लूँ।

लेकिन हरिजी को देखकर भीतर कुछ हिला। सबसे पहले वाद्य की सादगी। दूसरे वाद्यों की तरह स्वर मिलाने में समय नहीं लगा। साथ ले जाना आसान लगता था। हरिजी उसे इतना सुंदर और इतना सहज बजा रहे थे! उनके वरिष्ठ शिष्य रूपक कुलकर्णी बाँसुरी पर साथ थे। रूपक लगभग मेरी उम्र के हैं; तब हम दोनों किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में थे। वे इतना सुंदर और सहज बजा सकते हैं, तो वाद्य सरल ही होगा, मैंने सोचा। फिर भी वह हिंदुस्तानी संगीत के सभी पहलू और उससे अधिक प्रस्तुत करने में सक्षम मुख्यधारा का वाद्य लग रहा था।

चुनाव साफ़ था। वाद्य सीखने का छोटा रास्ता मिल गया, मैंने सोचा। लेकिन अठारह वर्ष बाद भी कठिन तरीके से सीख रहा हूँ कि हिंदुस्तानी संगीत में कोई छोटा रास्ता नहीं। बाँसुरी भी कोई नहीं देती।

दो वर्ष की शुरुआती शिक्षा के बाद कुछ साहस आया। जब हरिजी की शैली की नकल ही कर रहा हूँ, तो सीधे उन्हीं से क्यों न सीखूँ? एक सुबह हिम्मत जुटाकर उनके घर गया। उन्होंने कृपा करके अगले दिन आने को कहा। वापस गया, तो कुछ बजाने को कहा। घबराते हुए अहीर भैरव का भजन बजाया, इस आशा में कि भगवान मदद करेंगे। और उन्होंने की। मुंबई के नेशनल कॉलेज के पास हरिजी को विद्यार्थियों को सिखाने के लिए छोटा कमरा मिला था। उसका बिजली का फ़्यूज़ जल गया था। मेरे इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के विद्यार्थी होने से शायद मदद हुई, और मैं उनसे सीखने लगा।

अगला लगभग एक वर्ष कठिन था। उन्होंने कुछ ही राग सिखाए—यमन, देश, सारंग, अहीर भैरव, ललित, भैरवी। अधिकतर समय यमन पर गया। उनका आग्रह था, “एक साधे तो सब सधे।” एक राग अच्छी तरह सीखो, तो सभी सीखोगे। लेकिन लक्ष्य बहुत ऊँचे थे। वे सरल, लंबे स्वर बजाते और कितने सुंदर लगते! मैं वही करता, तो कोई तुलना नहीं।

सबसे बड़ी कठिनाई उनके सामने घबराए बिना बजाना थी। बाँसुरी में घबराहट तुरंत दिखती है, क्योंकि साँस उसे सबके सामने प्रकट कर देती है। तब मेरी बाँसुरी भी बहुत खराब थी। एक दिन उन्होंने मेरी बाँसुरी बजाई, तो मुझसे पूरा एक स्वर ऊँचा निकला। वे मुस्कराए, घर बुलाया और अपनी बाँसुरी दे दी। वह आज भी मेरे पास है। वर्षों तक उसमें पान की खुशबू रही।

इंजीनियरिंग पूरी होने पर मुंबई से लगभग सौ मील दूर पुणे चला गया। नौकरी में छह दिन काम और गुरुवार को छुट्टी थी। इसलिए सप्ताहांत में मुंबई जाकर सीखना कठिन हो गया। पुणे में दूसरों से सीखने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं लगा। वहीं एक खुले मैदान में विशाल भीड़ के सामने हरिजी और ज़ाकिर हुसैन के साथ तानपुरा बजाने की याद आज भी है।

प्रबंधन की पढ़ाई के लिए लखनऊ गया, तो हरिजी एक बार स्पिक मैके की संगीत-यात्रा पर आए। वे भारतीय प्रबंध संस्थान के हमारे परिसर में ठहरे। सुबह साढ़े आठ बजे एक स्कूल में उनका व्याख्यान-प्रदर्शन था। अतिथिगृह के देखभालकर्ता को सात बजे आकर नाश्ता बनाने को कहा था, लेकिन वह आया ही नहीं। मैं और दूसरा स्वयंसेवक बहुत डर गए। हरिजी से क्या कहेंगे—खाली पेट बजाइए? सर्द सुबह में एक बूँद चाय भी नहीं! जब बताया, तो उनकी प्रतिक्रिया ऐसी थी जैसे सबसे अच्छी बात हो गई। तुरंत बोले कि सड़क किनारे ढाबे पर जलेबी-समोसा खाने का मन है।

हम उन्हें लखनऊ के चौक ले गए। वहाँ हमने अपने जीवन की बेहतरीन जलेबी, समोसा और चाय ली। फ़रवरी की ठंड ने अनुभव और यादगार बना दिया। लखनऊ की विशेष मक्खन-मलाई भी खाई। हरिजी बिल्कुल सहज थे। लोगों ने पहचाना, प्रशंसा की और एक व्यक्ति ने शुभ पत्थर भी दिया। आज भी हरिजी लखनऊ की वह सुबह याद दिलाते हैं।

हरिजी हमेशा कहते थे: संगीत में सबसे महत्त्वपूर्ण है कि अपने हर स्वर का आनंद लो। तुम आनंद लोगे, तो श्रोता भी लेंगे। बाँसुरी के स्वभाव के अनुरूप संगीत सरल रखने से वह अधिक आकर्षक होता है। कई वादक अपनी प्रस्तुति को गायकी या तंत्रकारी शैली के अनुसार बनाते हैं। हरिजी ने बाँसुरी की प्रस्तुति पर गहरा विचार किया होगा। उनकी शैली दोनों का श्रेष्ठ लेकर बाँसुरी की अपनी खूबियाँ जोड़ती है। ध्यान से सुनें, तो उनके विस्तार में बार-बार यह दिखता है।

गुणीदास सम्मेलन के उस दिन बाँसुरी और उसके जादूगर ने मुझे सुखद धोखा दिया था। उस धोखे के लिए मैं सदा कृतज्ञ रहूँगा।

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की मैफ़िल

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के बारे में अधिक जानकारी

हरिजी की वेबसाइट और वृंदावन गुरुकुल—जीवनी और ध्वनिमुद्रणों की सूची।

कविता छिब्बर का हरिजी से साक्षात्कार उनके जीवन की असाधारण कहानी है। वे शुरुआती कठिनाइयों की बात करते हैं। सबसे विस्मयकारी लगा कि हिंदी फ़िल्म संगीत में स्थापित बाँसुरीवादक होने के बावजूद, गुरु श्रीमती अन्नपूर्णा देवी के प्रति समर्पण दिखाने के लिए उन्होंने दाएँ हाथ से बजाना छोड़कर बाएँ हाथ से शुरू किया। जिसने बाँसुरी का प्रयास किया हो, वह जानता है कि यह बिल्कुल शुरुआत से सीखने जैसा है।