सही पकड़

मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।

अगला कदम सही पकड़ सीखना और एक-एक छेद बंद करना है। पिछले चरण में सभी छेद खुले रखकर आवाज़ निकाली थी। अब उन्हें क्रम से बंद करने पर अलग, स्पष्ट स्वर निकलेंगे।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हर हाथ की छेद ढकने वाली तीन उँगलियाँ तेज़ी से चलने के लिए स्वतंत्र रहें। बाँसुरी थामने के लिए इन्हें कसकर न पकड़ें। वे यथासंभव हल्की रहें। ऊपरी हाथ की तर्जनी से बाँसुरी जकड़ना बहुत आम गलती है। बजाने वाली उँगलियाँ पकड़ में लगी हों, तो तेज़ नहीं चल पाएँगी और गति प्रभावित होगी।

आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि नीचे पकड़ के बारे में मेरा दृष्टिकोण है। इस विषय में कई दृढ़ मत और विरोधी मत हैं। उन्हें भी देखना चाहेंगे।

बाँसुरी की पकड़ के आधार-बिंदु

बाँसुरी तीन आधार-बिंदुओं पर टिकनी चाहिए:

  1. ठोड़ी।
  2. ऊपरी हाथ का अँगूठा, जो बाँसुरी को ठोड़ी की ओर धकेलता है।
  3. निचले हाथ का अँगूठा, जो संतुलन देता है।

दोनों हाथों की अनामिका और छोटी उँगली अतिरिक्त नियंत्रण दे सकती हैं, लेकिन जकड़ने का बल नहीं। ऊपरी अँगूठा पहले छेद से लगभग एक इंच दूर दबाव दे। निचला अँगूठा चौथे-पाँचवें छेद के बीच, छेदों से लगभग 90 से 120 डिग्री के कोण पर रहे।

अब साफ़ आवाज़ निकालना आ गया है, तो सभी छेद खुले रखकर सही पकड़ में बाँसुरी बजाएँ। पहले जैसी साफ़ आवाज़ सुनिश्चित करें। फिर सबसे ऊपर का छेद बंद करें। नया स्वर साफ़ सुनाई देता है? हाँ, तो तर्जनी उठाने और रखने का अभ्यास करें। स्वर समान अंतराल पर किसी लय में आएँ—1, 2, 1, 2, 1, 2…

यह सहज होने पर पहले दो छेद बंद करें। एक और नया साफ़ स्वर मिला? नहीं, तो शायद बंद छेद से हवा निकल रही है। जाँचकर फिर प्रयास करें। दूसरे छेद को खोलने-बंद करने का अभ्यास करें, ताकि स्वर स्पष्ट और समान लय में आएँ—1, 2, 1, 2… फिर तीनों सीखे स्वर क्रम से बजाएँ—1, 2, 3, 1, 2, 3… जब तक आवाज़ और अंतराल एकसमान न हों।

इसके बाद एक और छेद बंद करके यही दोहराएँ। एक-एक स्वर बढ़ाते हुए सभी छेद बंद करने तक जाएँ। किसी बंद छेद से हवा नहीं निकलनी चाहिए, वरना स्वर साफ़ नहीं होगा।

पकड़ की शैलियाँ

पंडित पन्नालाल घोष की पकड़

“सही पकड़” हिंदुस्तानी बाँसुरीवादकों में बहस का विषय है। मुख्यतः दो धाराएँ हैं। पंडित पन्नालाल घोष की शैली का अनुसरण करने वाले उँगलियों के सिरों से छेद बंद करते हैं। उनकी यह पुरानी तस्वीर वही पकड़ दिखाती है।

इसके समर्थक कई लाभ बताते हैं। उँगलियों पर अधिक नियंत्रण से कोमल स्वर आसानी से बजते हैं। निचले हाथ की छोटी उँगली से सातवाँ छेद बंद करने की सुविधा भी बताई जाती है, जिससे मींड का दायरा बढ़ता है।

दूसरी धारा पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की शैली के अनुयायियों की है। इसमें उँगलियों के बीच के हिस्से से छेद ढके जाते हैं, लेकिन हर हाथ का तीसरा छेद उँगली के सिरे से बंद होता है। हरिजी की तस्वीर में यह पकड़ दिखती है। इसके भी कई लाभ बताए जाते हैं। बहुत लोगों के लिए, विशेषकर लंबी उँगलियों वालों के लिए, यह अधिक स्वाभाविक है। गमक और लगातार मींड बजाना भी आसान है।

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की पकड़

यहाँ दोनों प्रचलित पकड़ें समझाई हैं। पसंद का निर्णय आप करें, लेकिन इनसे हटकर पकड़ बनाने में सावधानी बरतें। विशेष रूप से पश्चिमी फ़्लूट जैसी पकड़ ठीक नहीं। उससे बाँसुरी पर तेज़ स्वर-क्रम कठिन हो जाते हैं। पश्चिमी फ़्लूट की कुंजियाँ निश्चित तरीके से दबाई जाती हैं और कोमल स्वर अलग तरह से निकलते हैं। बाँसुरी में आधे स्वर बजाने की विधि के कारण ऊपर की किसी पकड़ का पालन करना महत्त्वपूर्ण है। पकड़ का निर्णय जीवनभर साथ रहेगा, इसलिए सोच-समझकर लें।