ध्यानमय संध्या और आनंदभरी शाम
मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।
· प्रसाद भंडारकर
भारतीय वैदिक दर्शन में संध्या का विशेष स्थान है। सूर्यास्त से ठीक पहले का समय अत्यंत ध्यानमय माना जाता है—अपने जीवन और अच्छे-बुरे कर्मों पर विचार करने का समय। यह दिन के अंत से, या उस दिन की “मृत्यु” से ठीक पहले का समय है। हम किसी भी दर्शन में विश्वास करते हों, इस बात से सहमत होंगे कि इस संसार से विदा होने से पहले मनुष्य अपने भीतर झाँकता है, जीवन पर विचार करता है और कर्मों के लाभ-हानि का हिसाब लगाता है। दिन की मृत्यु की यह कल्पना ऊपर से अजीब लगे, लेकिन यह समय बहुत पवित्र, भौतिक आसक्तियों से मुक्त है। यह मोक्ष, यानी मुक्ति का समय है।
इसी दर्शन को मानने वाली अनेक वैदिक परंपराएँ भी इस समय को महत्त्व देती हैं। आयुर्वेद, यानी पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति में इसे वात के समय का अंतिम भाग माना जाता है, और वात को क्षय तथा वृद्धावस्था से जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली का आठवाँ भाव इस समय से जुड़ा है। उसे मुक्ति का भाव माना जाता है, जिसे लोग गलती से मृत्यु का भाव और इसलिए अशुभ समझते हैं।
वैदिक दर्शन में गहरी जड़ें रखने वाले भारतीय शास्त्रीय संगीत में इस समय से जुड़े रागों का पूरा वर्ग है। इन रागों में प्रायः रहस्य का भाव होता है। मारवा, पूरिया, पूर्वी, श्री, गौरी और पूरिया धनाश्री इनमें प्रमुख हैं।
राग मारवा अनोखा और विचित्र है, क्योंकि इसे गाते-बजाते समय सा का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। सा, अर्थात षड्ज—जो बाकी छह स्वरों को जन्म देता है—पृष्ठभूमि में तानपुरे पर संदर्भ के लिए बजता रहता है। लेकिन राग के विस्तार में उसका कम प्रयोग एक अस्थिर, व्याकुल भाव पैदा करता है। मैंने मारवा की जो बेहतरीन प्रस्तुतियाँ सुनी हैं, उनमें उस्ताद विलायत ख़ाँ की प्रस्तुति शामिल है।
राग पूरिया धनाश्री की एक विशेष रचना मुझे बहुत प्रिय है। यहाँ मेरी पसंदीदा गायिकाओं में से एक, डॉ. वीणा सहस्रबुद्धे की गाई हुई उसकी प्रस्तुति है। रचना के शब्दों का भाव है—आज का दिन समाप्त हो रहा है; अब तुम्हारे ध्यान करने का समय है।
राग श्री में पंडित कुमार गंधर्व की यह अनमोल प्रस्तुति है। बीमारी के कारण कुमारजी के फेफड़े के कुछ हिस्से निकालने पड़े थे। इससे उनकी शारीरिक क्षमता बहुत कम हो गई थी और उन्हें न गाने की सलाह दी गई थी। उनकी प्रतिभा ऐसी थी कि उन्होंने गायन की एक नई शैली विकसित की, जिसमें लंबे स्वरों की जगह लय पर छोटे, प्रभावशाली आघातों को महत्त्व मिला। इस अंश में गाया श्री का तराना उनकी शैली का सुंदर उदाहरण है—ध्यान दीजिए, शब्दों की फेंक से वे लय को कैसे उभारते हैं।
वैसे, संध्या के साथ मृत्यु और मुक्ति का संबंध सुनकर जिन्हें आश्चर्य या उदासी हो रही हो, उनके लिए अगली प्रस्तुति आशा जगाएगी। जीवन-चक्र की तरह दिन का चक्र भी चलता रहता है। सूर्यास्त दिन की मृत्यु है, तो रात का जन्म भी है। और जन्म का उत्सव उस सारे आनंद के साथ मनाया जाता है, जो नवजात संसार में लाता है। सूर्यास्त के बाद के राग इसी आनंद को व्यक्त करते हैं। राग यमन ऐसे रागों का राजा है। देखिए, ऊपर के रागों से इसका प्रभाव कितना अलग है।