Pandit Hariprasad Chaurasia playing bansuri — original poster
विचार

सादगी भरे दिन

मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादित।

· प्रसाद भंडारकर

इस बुधवार मेरी कक्षाओं में हम राग यमन का अभ्यास कर रहे थे। मैं विद्यार्थियों को एक सरल गत सिखा रहा था। उसे बजाते हुए मुझे हरिजी से सीखने के अपने दिन याद आए, और अचानक याद आया कि उन दिनों की कुछ कक्षाओं की रिकॉर्डिंग मेरे पास हैं।

वे सादगी भरे दिन थे। मैं मुंबई के वीजेटीआई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। मेरे माता-पिता पुणे चले गए थे और मैं मुंबई के शिवाजी पार्क में दादा-दादी के साथ रहता था। मुझे महीने के पूरे १००० रुपये जेबखर्च मिलते थे—आज की मुद्रा में २५ अमेरिकी डॉलर। कॉलेज आने-जाने, दोपहर के खाने और किताबों जैसे बुनियादी खर्च इसी से चलते थे। फिर भी मुंबई के रिदम हाउस से ऑडियो कैसेट और एलपी रिकॉर्ड खरीदने के लिए कुछ “बचत” रह जाती थी।

हरिजी का मुंबई वाला आज का गुरुकुल तब नहीं था। लेकिन सिखाने के प्रति उनमें गहरा जुनून था। दुनियाभर की यात्राओं से उनका कार्यक्रम बहुत कठिन रहता था। फिर भी जब भी मुंबई में होते, सुबह ११ से दोपहर डेढ़-दो बजे तक हमें बिना चूके सिखाते थे।

कक्षाएँ बांद्रा में नेशनल कॉलेज के पास, लिंकिंग रोड से कुछ हटकर एक जर्जर खुले रंगमंच के बाहर बने कमरे में लगती थीं। सरकार ने उन्हें पढ़ाने के लिए यह कमरा दिया था। उसकी हालत खराब थी, लेकिन हरिजी ने अपने पैसे लगाकर उसकी सफाई और रंग-रोगन करवाया। कमरा सड़क के बिल्कुल पास था। रिकॉर्डिंग में यातायात सुनाई देता है—कभी पास से गुज़रती बेस्ट बस, तो कभी रिक्शे का हॉर्न।

कमरे में जर्मनी में हुए हरिजी के किसी कार्यक्रम की प्रचार-सामग्री वाला पोस्टर भी लगा था। तस्वीर के गहन और शांत भाव मुझे बहुत प्रेरित करते थे। कुछ वर्षों बाद हरिजी के बेटे राजीव ने मुझे उस पोस्टर की एक प्रति दी, जो आज भी मेरे पास है।

मेरे थोड़े-से जेबखर्च में रिकॉर्डिंग का उपकरण खरीदना संभव नहीं था। बाँसुरी खरीदना भी मुश्किल से हो पाता था। अच्छी बनी कुछ बाँसुरियों की कीमत लगभग ७५ डॉलर थी, जो मेरे बजट से बहुत अधिक थी। भारत में तब वॉकमैन जैसे उपकरणों के आयात पर कड़े प्रतिबंध भी थे। लेकिन मेरे साथ पढ़ने वाली फ़्रांस की फ़्रांस्वाज़ और कनाडा की कैथरीन ने उदारता से कुछ रिकॉर्डिंग मुझे दीं। दुख की बात है कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों का निधन हो गया।

सप्ताह के कामकाजी दिनों में कक्षा छोटी होती थी, लेकिन सप्ताहांत में रूपक कुलकर्णी और राकेश चौरसिया जैसे वरिष्ठ विद्यार्थी आते, तो संख्या बढ़ जाती थी।

मुझे यह अनुभव बेहद प्रिय था। इन कक्षाओं में आने के लिए मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज की कई कक्षाएँ छोड़ी होंगी। हरिजी के प्रति मन में बहुत आदर और विस्मय था। वे हमें अपने सभी स्थानीय कार्यक्रमों में ले जाते थे। एक यादगार कार्यक्रम मुंबई के पास एलिफेंटा गुफाओं में एक विशाल बरगद के नीचे हुआ था। वहाँ हम छोटी नाव से गए थे।

ये रही वे रिकॉर्डिंग। ये १९८९–९१ के बीच की हैं; सही तारीख याद नहीं। आशा है, इतने वर्षों बाद भी ये आपको उतनी ही प्रेरक लगेंगी, जितनी मुझे लगती हैं।